Wednesday, June 26, 2013

त्रिवेणी




बागों के कोलाहल से सन्नाटे पुकारते हैं 
मिलजुल सब संगी पखेरू शफक बुहारते हैं 

चले भी आओ कि अब तो सांझ होती है !

- वंदना

Thursday, June 6, 2013

त्रिवेणी




छोटे से हैं पंख और आकाश नापते हो 
सुना है आकाश में सितारे बांटते हो ...

ख़्वाब और हकीकत का फर्क जानते हो ??? 




-- वंदना

खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं,  रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी  भीड़ में  फैली...