Friday, May 28, 2010

चंद आशार

दो पल के लिए जरा गोर से सुन लो ये शोर ..
शायद कल बरसात फिर होगी मगर ,यूँ
गूँज उठी धरती जिसकी चीखो से
ऐसा तड़पता हुआ ये बादल ना मिलेगा...

अपनी निस्वार्थ इस ममता कि पावन गोद में
मुझको रो लेने दे माँ तू दो पल लिए ..
मेरे अश्क जमीं पे गिरके रह जायेंगे कल
जो सोख ले सारी पीर मुझे वो आँचल ना मिलेगा...

कोई इल्तजा भी ना बाकी रह जाए
जितना हो सके उतना तडपाइए ...
नम आँखे मिलेंगी बहुत तुमको मगर
मेरे अश्को से तरबदर ये काजल ना मिलेगा..

कोई अरमाँ भी ना बाकी रह जाये
बेझिझक मुझपर हसाँ कीजिये ,
इस नजाकत भरे शहर में ,मेरा दावा है
तुमको कोई मुझ सा पागल ना मिलेगा ...

Monday, May 24, 2010

कैसे ना देखूं आँखों का दर्पण



कैसे मोन करूँ अश्को को
कैसे मन कि गिरह छुपाऊं
कैसे ना देखूं आँखों का दर्पण
कैसे खुद को, मैं झूठलाऊं ...

तुम गौरव कि जैसे गरिमा
तुम पावक दिए कि ज्योति
कैसे सौंप दूं तुझको अपने
बेमोल अश्को के मोती..

तुम ह्रदय के पावन तट पर
एहसासों कि मोंज तूफानी
मैं पलकों के साहिल पे जैसे
किसी ख्वाब कि मौन कहानी ..

मैं लिखूं प्रीत का गीत कोई
मगर अर्थ कहाँ से लाऊं

कैसे मोन करूँ अश्को को
कैसे मन कि गिरह छुपाऊं
कैसे ना देखूं आँखों का दर्पण
कैसे खुद को मैं झूठलाऊं

ह्रदय मानों कुछ जीत गया
नयन जब सुधिया हारे ,..
लहरों कि अल्हड़ता सहते
जैसे खामोश किनारे..

तुम ढलती सांझ कि जैसे धूप
मैं मरुथल सी तपती रेती ...
तुम प्यास में बँटते गर बादल से
मैं भी चितवन को नम कर लेती..

चाँद तारों से तुझको मांग लूं
या मैं ,आज खुदा अजमाऊं

कैसे मोन करूँ अश्को को
कैसे मन कि गिरह छुपाऊं
कैसे ना देखूं आँखों का दर्पण
कैसे खुद को मैं झूठलाऊं


वक्त ने गिरह संग सौपी
मुझको ये अनमोल सोगातें ..
याद़ों के मौसम को पाया मैंने
गिरवी रखकर दिन और रातें

पलकों से झर झर झर झरती
पीर कि अनूठी करामातें
जहन के रेतीले आँगन में
जैसे फाल्गुन कि बरसातें

लड़ मरूं मैं सारी दुनिया से
मगर खुद से कैसे टकराऊं

कैसे मोन करूँ अश्को को
कैसे मन कि गिरह छुपाऊं
कैसे ना देखूं आँखों का दर्पण
कैसे खुद को मैं झूठलाऊं

नयन कलश से रीते रीते
कमंडल से हैं प्यासे ..
मन के सूने पनघट पर ..
जैसे ख्वाइशो के मृग प्यासे .

भीगी भीगी पलकों में
यूँ जले ख़्वाब के मोती ...
साँझ कि सुनहरी धूप में
जैसे तपती साहिल कि रेती ..

अहम् तजूं एह्न्कार तजूं ,जिन्दगी कि
रीत से, आगे कदम बढ़ाऊं,,

कैसे मोन करूँ अश्को को
कैसे मन कि गिरह छुपाऊं
कैसे ना देखूं आँखों का दर्पण
कैसे खुद को मैं झूठलाऊं..



Friday, May 14, 2010

याद आता है





वो गाँव .....वो गली......... वो घर याद आता है
छोड़ आयें है जहाँ बचपन वो शहर याद आता है..

लेती है यहाँ जिन्दगी हर रोज नया इम्तिहान
बुजुर्गो कि दुआंओ का वो असर याद आता है ..

फुर्सत के दिन ..जब यूँ अकेले में गुजरते हैं
मुझे मेरी नानी का बहुत .वो घर याद आता है..

वो कबूतर से प्रेम ....और कोएँ से दुश्मनी
बूढ़े नीम पर चिड़ियों का वो बसर याद आता है ..

तारो कि महफ़िल पे...... वो चांदनी का पहरा
चाँद संग अपनी नींदों का वो सफ़र याद आता है..

रो लेते हैं जी भरके मगर चैन नहीं मिलता
जितना भुलातें है उतना. वो बेखबर याद आता है ...

जाने क्यूं कोई ख़्वाब बुना था इन गुस्ताख आँखों ने
मासूम दिल कि तबाही का वो मंजर याद आता है...

Thursday, May 6, 2010

गजल...



उसकी मासूमियत पर कभी हिमायत नहीं आती,
जहन में फिर भी मगर शिकायत नहीं आती..

उस मुजरिम को सीने में कैद करके रखते ,
मगर हिस्से में अपने ये इनायत नहीं आती ..

खुद से बिगड़ना तो कोई जरा हमसे सीखे ,
मगर अपनों से करनी हमें बगावत नहीं आती ..

एहसास बाँवरे...पलकों पे.. बसने चले आये ,
संजीदगी जज्बात कि..बनकर अदावत नहीं आती ..

सपनो में ,ख्वाइशो में..., है उलझी एक पहेली सी,
क्यूं जिन्दगी बनकर एक सच्ची आयत नहीं आती..

बुजुर्गो ने समझाई थी चार लफ्जों में जिन्दगी,
भूल गये हैं .अब वो पुरानी कहावत नहीं आती..

खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं,  रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी  भीड़ में  फैली...